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हिंदी भाषा नहीं हमारी आत्मा है : डॉ. रणधीर कुमार

Dr. Randhir Kumar Hindi Article

हिंदी दिवस के अवसर पर समस्त हिंदीप्रेमियों को हार्दिक शुभकामनाएँ। हिंदी केवल अक्षरों और शब्दों का संसार नहीं है। यह हमारी स्मृतियों की भाषा है, हमारी संवेदनाओं की भाषा है, हमारे लोकजीवन की भाषा है और उस भारत की आवाज़ है, जिसकी आत्मा अनेक भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और परंपराओं में एक साथ धड़कती है।

किसी भाषा की प्रासंगिकता केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसे कितने लोग बोलते हैं, बल्कि इससे होती है कि वह कितने मनुष्यों को जोड़ती है, कितने विचारों को जन्म देती है और कितनी पीढ़ियों की स्मृतियों को अपने भीतर सुरक्षित रखती है। इस दृष्टि से हिंदी का महत्व और भी व्यापक हो जाता है।

हिंदी ने भारत के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में संवाद की एक ऐसी धारा निर्मित की है, जिसमें गाँव की मिट्टी की गंध भी है, शहरों की गति भी; लोकगीतों की सहजता भी है, साहित्य की गंभीरता भी; संघर्ष की आवाज़ भी है और मानवीय संवेदना की कोमलता भी।

हिंदी की शक्ति उसकी सरलता में है, उसकी आत्मीयता में है और सबसे बढ़कर उसकी स्वीकार करने की क्षमता में है। उसने समय-समय पर अनेक भारतीय भाषाओं और संस्कृतियों से शब्द, भाव और अभिव्यक्तियाँ ग्रहण कर स्वयं को समृद्ध किया है। यही जीवंतता किसी भाषा को केवल भाषा नहीं रहने देती, उसे एक सांस्कृतिक चेतना बना देती है।

आज का समय तकनीक और वैश्वीकरण का समय है। संवाद के माध्यम बदल रहे हैं, शब्दों के स्वरूप बदल रहे हैं और ज्ञान की सीमाएँ निरंतर विस्तृत हो रही हैं। ऐसे समय में हिंदी के सामने चुनौती केवल उसके संरक्षण की नहीं, बल्कि उसे ज्ञान-विज्ञान, शोध, तकनीक, प्रशासन और आधुनिक चिंतन की प्रभावशाली भाषा बनाने की भी है।

हमें हिंदी को केवल समारोहों और भाषणों की भाषा नहीं बनाना है। उसे प्रयोग की भाषा बनाना है, ज्ञान की भाषा बनाना है, रोजगार और तकनीक की भाषा बनाना है और आने वाली पीढ़ियों के सपनों एवं आकांक्षाओं की भाषा बनाना है।

साथ ही, हिंदी का गौरव तभी सार्थक होगा जब हम भारत की सभी भाषाओं और बोलियों के सम्मान को भी अपना दायित्व समझें। भारत की भाषाई विविधता हमारी कमजोरी नहीं, बल्कि हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति है। हिंदी का भविष्य भारतीय भाषाओं के साथ संवाद और सह-अस्तित्व में ही अधिक उज्ज्वल है।

आज हिंदी दिवस पर आवश्यकता केवल हिंदी बोलने की शपथ लेने की नहीं, बल्कि हिंदी में सोचने, सृजन करने, शोध करने और नई पीढ़ी के लिए नए ज्ञान का संसार निर्मित करने के संकल्प की है।

क्योंकि भाषा तभी जीवित रहती है, जब वह समय के साथ चलती है।

और भाषा तभी महान बनती है, जब उसमें केवल शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य के सपने, संघर्ष, संवेदनाएँ और भविष्य बोलता है।

आइए, हिंदी को केवल अपनी भाषा होने का गौरव न दें, बल्कि उसे अपने कर्म, चिंतन और सृजन से समृद्ध करने का संकल्प लें।

  • हिंदी हमारी अभिव्यक्ति है।
  • हिंदी हमारी संवेदना है।
  • हिंदी हमारी सांस्कृतिक स्मृति है।
  • और हिंदी भारत की विविध आत्माओं के बीच संवाद का एक सशक्त सेतु है।